*बाइबल पढ़ने का उद्देश्य – परमेश्वर को खोजना*
_`तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे। (यिर्मयाह 29:13)`_
हम में से बौहतों के लिए वचन पढ़ने का उद्देश्य सिर्फ प्रतिदिन पूरा करने वाली एक प्रथा या क्रिया बन कर रह गया है। ऐसा करने से हम वचन पढ़ने से ऊब जाते हैं और वचन पढ़ने में नीरसता का अनुभव होता है। जब कि परमेश्वर का वचन जीवित जल का एक ऐसा सोता है, जिसे सुनने व पढ़ने से हमारे ह्रदय में से जीवित जल के चश्मे फूट पड़ते हैं। यह सिर्फ तभी संभव है जब हम पवित्र वचन को परमेश्वर को खोजने के लिए पढ़ें और वो भी खुद की बुद्धि से नहीं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा की सहायता से।
परमेश्वर यिर्मयाह 29:13 में कहता है कि `तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।`
तो उस महान अदृश्य परमेश्वर को कहाँ और कैसे ढूंढे, जो इतना विशाल है कि हाथ के बनाए मंदिरों में नहीं रहता? वचन ही एकमात्र ऐसा माध्यम है, जिसमें हम परमेश्वर को खोज करके उसे पा सकते हैं। जब पवित्र बाइबल के इन जीवित वचनों में हम परमेश्वर को खोजने पर पा लेते हैं, तो हम अपने ह्रदय में परमेश्वर का वो अपार आनंद और शांति महसूस करते हैं, जो बयान से परे है। तब वचन पढ़ना हमारे लिए कभी ऊबने का कारण बन ही नहीं सकता, बल्कि परमेश्वर के और करीब जाने का एक अहम ज़रिया बन जाता है।
मसीह में आपका भाई
प्रेरित अशोक मार्टिन