दिन 74 —
*आप जो बना रहे हैं, उसका वास्तविक स्वामी कौन है?*
> `“कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता; क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक से लगा रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।” (मत्ती 6:24)`
*1 राजा 6–9* : हर जीवन एक इमारत के समान है, पर हर निर्माण का स्वामी सही नहीं होता। सुलैमान भव्य निर्माण करता है, फिर भी उसे चेतावनी दी जाती है कि आज्ञा न मानने से परमेश्वर की उपस्थिति उससे हट सकती है।
*श्रेष्ठगीत 1–2* : श्रेष्ठगीत का प्रेम सिखाता है कि निकटता वहीं टिकती है जहाँ निष्ठा सुरक्षित रखी जाती है—उसे स्वाभाविक मानकर छोड़ नहीं दिया जाता।
*होशे 6–10* : होशे उस खतरे को उजागर करता है जब मनुष्य पश्चाताप को टालता रहता है, यहाँ तक कि पाप सामान्य लगने लगता है और आराधना केवल एक आदत बन जाती है।
*प्रकाशितवाक्य 13–14* : प्रकाशितवाक्य अंतिम विभाजन दिखाता है—एक ओर वे जो समझौते की छाप धारण करते हैं, और दूसरी ओर वे जो मेम्ने के प्रति निष्ठा में मुहरबंद हैं।
आप जो लगातार चुनते हैं, वही आपकी सेवा बन जाता है।
जिसे आप बहाना देकर छोड़ देते हैं, वही शीघ्र आप पर अधिकार करने लगता है। और जिसे आप सबसे अधिक प्रेम करते हैं, वही आपकी पूर्ण निष्ठा माँगता है।
परमेश्वर भव्य चढ़ावों की नहीं, बल्कि अविभाजित हृदय की माँग करता है; धार्मिक गतिविधियों की नहीं, बल्कि प्रतिदिन की आज्ञाकारिता की; क्षणिक भावनात्मक अनुभवों की नहीं, बल्कि जीवनभर के समर्पण की।
आज का प्रश्न सरल है, पर टाला नहीं जा सकता:
जब दबाव बढ़ता है और छल हानिरहित प्रतीत होता है, तब वास्तव में आपके निर्माण का स्वामी कौन है?
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन