*मूर्तियों को आराधना के उपकरण बनाना*

`“हे यहोवा, हमारी नहीं, हमारी नहीं, परन्तु अपने नाम की महिमा कर।” — भजन संहिता 115:1`
इस सिद्धांत में एक गहरा सत्य छिपा है — *किसी भी चीज़ को अपना ईश्वर बनने से रोकने का एक ही तरीका है: उसे अपने ईश्वर की सेवा में लगा दो।* जो भी वस्तु प्रभु की सेवा नहीं करती, वह शीघ्र ही तुम्हारे ऊपर राज्य करने लगती है। जिस क्षण कोई आशीष अपने देने वाले की महिमा करना छोड़ देती है, वह छिपी हुई मूर्ति बन जाती है।
यदि तुम्हारा *धन, सौंदर्य, प्रभाव या सफलता* आपके हृदय में प्रभु के स्थान को पाने की कोशिश करने लगे, तो उन्हें राजा येशु के अधीन कर दो। उन्हें उसके सिंहासन के सामने झुकने की आज्ञा दो। अपने *संपत्ति को आराधना का उपकरण*, अपनी *प्रतिभा को स्तुति का माध्यम*, और अपने *प्रभाव को उसकी महानता की गवाही* बना दो।
आपका *धन* सुसमाचार के फैलाव की सेवा करे। आपका *घर* प्रभु के दासों का आतिथ्य करे। आपका *सौंदर्य* उसकी पवित्रता को प्रदर्शित करे। आपकी *आवाज़* लोगों को आपके साथ परमेश्वर की आराधना करने को प्रेरित करे। आपकी *सफलता* आपके ऊपर उसके राज्य की घोषणा करे।
क्योंकि परमेश्वर के राज्य में कुछ भी वास्तव में आपका नहीं होता जब तक आप उसे उसके चरणों में अर्पित न कर दे। जैसे अब्राहम तब तक इसहाक का असली स्वामी या हकदार नहीं बन सका जब तक उसने उसे बलिदान करने की इच्छा नहीं जताई। उसी प्रकार जो कुछ आप प्रभु को समर्पित करता है, वह पवित्र हो जाता है; और जो कुछ आप रोककर रखता है, वही आपको बाँध लेता है।
आपकी हर साँस, हर वरदान, हर संसाधन, हर धड़कन यह घोषणा करे — *यीशु ही मेरा प्रभु और राजा है।*
क्योंकि आराधना का सर्वोच्च रूप वह गीत नहीं जो आप गाते है, बल्कि वह *समर्पण है जो आप स्वयं बन जाते है* — जब तक कि आपकी सफलता भी झुककर कहे, *“यीशु ही प्रभु है।”*
इसलिए, *जिस किसी में भी श्वास है*, और जिसे भी उसने श्वास दी है, *वह यहोवा की स्तुति करे!* 🙌
मसीही में आपका भाई,
*प्रेरित अशोक मार्टिन*