*लोगों की सोच से प्रेरित मत हो!*

`इस पर येशु ने उनसे कहा, “तुम लोग मनुष्यों के सामने तो धर्मी होने का ढोंग रचते हो, परन्तु परमेश्वर तुम्हारा हृदय जानता है। जो बात मनुष्यों की दृष्टि में महत्व रखती है, वह परमेश्वर की दृष्टि में घृणित है। लूकस 16:15`
मनुष्य सोचते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं और जो कुछ भी वे चाहते हैं, सोच सकते हैं, और परमेश्वर इसे नहीं जान पाएगा। परमेश्वर उन चीज़ों से घृणा करता है जिन्हें शारीरिक मनुष्य महान समझते हैं। यह सिद्धांत तब तक सत्य रहेगा जब तक संसार पापी मनुष्यों द्वारा आबाद है। यह सिद्धांत कई अन्य चीज़ों पर भी लागू होता है जिन्हें सामान्य रूप से मनुष्य बहुत महत्व देते हैं।
यीशु ने कहा, _”कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता।”_ परमेश्वर के अलावा, कई अन्य बातें हो सकती हैं जो आपके जीवन को चला रही हैं, लेकिन सभी एक ही अंजाम की ओर ले जाती हैं: अधूरी क्षमता, अनावश्यक तनाव और अधूरा जीवन। इसलिए अपने जीवन के लिए परमेश्वर के उद्देश्यों को जानने से ज़्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, और इसे न जानने की भरपाई कोई और बात नहीं कर सकती- न धन, न प्रसिद्धि, न ही मौज मस्ती। उद्देश्य के बिना, जीवन बस अर्थहीन दौड़, दिशाहीन काम और कारणहीन घटनाएँ हैं। सही उद्देश्य के बिना जीवन तुच्छ, छोटा और व्यर्थ है।
इसलिए बहुत से लोग ऐसे लोगों की स्वीकृति पाने को अपना उदेश्य बना लेते हैं। वे माता-पिता या जीवनसाथी या बच्चों या शिक्षकों या दोस्तों की अपेक्षाओं को अपने जीवन पर नियंत्रण करने देते हैं और उसे अपना उदेश्य बना लेते है। कई वयस्क अभी भी सांसारिक माता-पिता की स्वीकृति पाने की कोशिश कर रहे हैं। अन्य लोग साथियों के दबाव से प्रेरित होते हैं, हमेशा इस बात से चिंतित रहते हैं कि दूसरे क्या सोचेंगे। दुर्भाग्य से, जो लोग भीड़ का अनुसरण करते हैं वे आमतौर पर इसी में खो जाते हैं। असफलता का एक कारण सभी को खुश करने की कोशिश करना है। दूसरों की राय से नियंत्रित होना आपके जीवन के लिए परमेश्वर के उद्देश्यों से चूकने का एक निश्चित कारण है।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन