शनिवार // 30 नवंबर 2024

अपने दिलों में यीशु मसीह को पवित्र जानो!
> पर मसीह को प्रभु जान कर अपने अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ। 1 पतरस 3:15
बहुत से लोग परमेश्वर को झूठा कहने की हिम्मत नहीं करेंगे, ताकि वे ईशनिंदा करने के दोषी न हों और क्षमा से वंचित न हों। लेकिन जो मुँह से नहीं कहा जाता, वह दिल से प्रकट होता है। हम कैसे जीते हैं, यह इस बात से प्रकट होता है कि हम परमेश्वर के बारे में क्या मानते हैं। अगर वह हमारे लिए ‘प्रभु’ है, तो हम उसकी सेवा करेंगे। अगर हम मानते हैं कि वह ‘सृष्टिकर्ता’ है, तो हम उसके सामने विनम्र होंगे। अगर वह हमारे लिए ‘उद्धारकर्ता’ है, तो हम उस पर भरोसा करेंगे।
हमारे मानवीय स्वभाव की समस्या यह है कि यह हमारे दिमाग को भ्रष्ट कर देता है, हमारे अहंकार को बढ़ाता है, हमारी दृष्टि को धुंधली करता है, और हमारी समझ को अंधकारमय कर देता है, ताकि जब परमेश्वर हम पर कुछ प्रकट करे, तो हम उसकी सत्यनिष्ठा का अवलोकन अपने मेहसूसीकरण के मुताबिक करें। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी अविश्वास भावनात्मक होते हैं, बल्कि इसका मतलब यह है कि परमेश्वर के बारे में हम जो विश्वास करते हैं, उसके बारे में हमारा निर्णय लेना कभी भी हमारी भावनाओं से अलग नहीं होता है।
परमेश्वर ने अपने बारे में जो कहा है, उस पर विश्वास न करने का परिणाम यह होता है कि उसने जो बनाया है, उसे भगवान बना लिया जाता है। अगर हम वास्तव में यह मान लेते हैं कि परमेश्वर वही है जो वह कहता है, तो हमारे पास बस एक ही विकल्प बचता है: वह है उसकी आराधना करना। लेकिन अगर हम अपना ध्यान स्वयं पर केंद्रित करते हैं, खुद को अपने आनंद का स्रोत बनाते है और अपने जीवन का अंतिम अधिकारी भी खुद बनते हैं, तो हमारे मन में, प्रभु पवित्र नहीं हो सकता!
लेकिन खुश ख़बर यह है कि परमेश्वर की धार्मिकता हमारे विश्वास से स्वतंत्र है। चाहे हम मानें कि वह पवित्र है या नहीं, वह हमेशा वही रहेगा जो वह हमेशा से रहा है।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन