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विनम्रता: सृष्टि की महिमा

मंगलवार // 23 जनवरी 2024 विनम्रता: सृष्टि की महिमा “अपने अपने मुकुट सिंहासन के साम्हने यह कहते हुए डाल देंगे। कि हे हमारे प्रभु, और परमेश्वर, तू ही महिमा, और आदर, और सामर्थ के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएं सृजीं और वे तेरी ही इच्छा से थीं, और सृजी गईं॥” प्रकाशितवाक्य 4:11 जो जीवन परमेश्वर हमें प्रदान करता है, वह एक बार के लिए ही नहीं, बल्कि लगातार है, यह हर पल उसकी महान सामर्थ के निरंतर संचालन द्वारा प्रदान किया जाता है। विनम्रता, जो कि परमेश्वर पर संपूर्ण निर्भर होने का स्थान है, यह हर प्राणी का पहला कर्तव्य और एक व्यक्ती का सर्वोच्च गुण है, और हर सदगूण की जड़ है। घमंड या इस विनम्रता का खोना, हर पाप और बुराई की जड़ है। ऐसा तब भी हुआ जब स्वर्ग से गिरे हुए दूतों ने खुद को आत्मसंतुष्टि के साथ देखना शुरू किया जिससे कि वे आज्ञा-उल्लंघन की ओर चले गये, और वे स्वर्ग की रोशनी से निकाल कर घोर अन्धकार में फेंक दिए गए । ऐसा तब भी हुआ, जब साँप ने हमारे पहले माता-पिता के हृदयों में अपने घमंड का ज़हर, परमेश्वर के रूप में बनने की इच्छा का ज़हर फूंका, जिस से वे भी परमेश्वर की महिमामय संपत्ति से उस दुर्गति में गिरे जिसमें मनुष्य अब डूब चुका है। स्वर्ग में और पृथ्वी पर, अहंकार, घमंड, आत्म-प्रशंसा, नरक से उत्पन्न एक द्वार और अभिशाप है। यह विनम्रता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो अपने आप आ जाएगी, बल्कि इसे विशेष इच्छा और प्रार्थना और विश्वास और अभ्यास का विषय बनाया जाना चाहिए। मसीह में आपका भाई, प्रेरित अशोक मार्टिन

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