
उदारता, शांति और धर्म में दृढ़ता
“धार्मिकता का फल शांति होगा, और धार्मिकता का परिणाम सदा का चैन और निश्चय।” — यशायाह 32:17
सच्ची उदारता केवल संपत्ति का देना नहीं है — यह वह समर्पण है जिसमें मनुष्य अपनी वैध चीज़ भी शांति के लिए छोड़ देता है। जब अब्राहम ने लूत को पहले पसंदीदा भूमी चुनने दी (उत्पत्ति 13:8–9), तो उन्होंने दिखाया कि वे पद या अधिकार से अधिक शांति को महत्व देते हैं। उन्हें विश्वास था कि उनका वास्तविक उत्तराधिकार परमेश्वर ही है। ऐसा त्याग कमजोरी नहीं, बल्कि विश्वास से उपजी सामर्थ है।
परंतु ऐसा त्याग कभी समझौता नहीं बनना चाहिए। जब चुप्पी रहना पाप को छिपाने लगे, और ऐसी शांति अधर्म की रक्षा करने लगे — तब ऐसा चुप रहना अपराध बन जाता है। ऐसे क्षण आते हैं जब परमेश्वर हमें पीछे हटने नहीं, बल्कि दृढ़ होकर खड़े होने के लिए बुलाता है।
यीशु, जो नम्र और दीन हृदय के थे (मत्ती 11:29), मंदिर में शांति के शब्द लेकर नहीं, बल्कि धार्मिकता का कोड़ा लेकर प्रवेश किया (यूहन्ना 2:13–17)। उनके अंदर पिता के घर के प्रति जलन थी। वही मसीह जिसने कहा, “धन्य हैं वे जो मेल मिलाप करवाते हैं” (मत्ती 5:9), उसने यह भी कहा, “मैं शांति नहीं, परन्तु तलवार लेके आया हूँ” (मत्ती 10:34) — वह सत्य की तलवार जो प्रकाश और अंधकार को अलग करती है।
सत्य के बिना आनेवाली शांति, झूठी शांति है। अन्याय के सामने मौन रहना विनम्रता नहीं, बल्कि बुराई में सहभागी होना है। जब विवाद अहंकार के कारण उठे, तो धर्मी को अब्राहम की तरह हट जाना चाहिए। पर जब विवाद परमेश्वर के उद्देश्य से जुड़ा हो, तब चुप रहना स्वयं पाप बन जाता है।
इसलिए, आपका हृदय कोमल रहे, पर आत्मा दृढ़ हो। शांति को बचाने की कोशिश नहीं, शांति को बनाने की कोशिश करें। क्योंकि वह शांति जो परमेश्वर को प्रसन्न करती है, वह धार्मिकता से उत्पन्न होती है — सत्य से बचने से नहीं उत्पन्न होती।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन