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क्या मैं कुछ भी बाँध या खोल सकता हूँ?


क्या मैं कुछ भी बाँध या खोल सकता हूँ?

“मैं तुम्हें स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दूँगा; और जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे (जिसे अनुचित या अवैधानिक ठहराओगे) वह स्वर्ग में पहले ही बाँधा जा चुका होगा; और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे (जिसे वैध या उचित ठहराओगे) वह स्वर्ग में पहले ही खोला जा चुका होगा।”— मत्ती 16:19 (AMPC)

*बाँधने और खोलने का अर्थ:*

यीशु के समय में यहूदी रब्बियों की भाषा में

👉 “बाँधना” (*deō / asar*) का अर्थ था किसी बात को *निषिद्ध ठहराना* या *अनुचित घोषित करना*।

👉 “खोलना” (*luō / hitir*) का अर्थ था किसी बात को *अनुमति देना* या *दैवीय अधिकार से उचित ठहराना*।

जब यीशु ने कहा — *“मैं तुम्हें स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दूँगा…”* — तो वे आत्मिक अधिकार की बात कर रहे थे।

मतलब — पृथ्वी पर स्वर्ग की प्रभुता का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार।

जो कुछ हम “बाँधते” या “खोलते” हैं, वह स्वर्ग में पहले से ठहराई गई बातों के अनुरूप होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हम स्वर्ग को आदेश दें, बल्कि स्वर्ग ने हमें अधिकार दिया है कि हम *पृथ्वी पर परमेश्वर की इच्छा लागू करें* (मत्ती 6:10)।

⚔️ *बाँधना* = शैतानी गतिविधियों, छल और पाप को रोकना।

💫 *खोलना* = परमेश्वर की योजनाओं, चंगाई, शांति और मुक्ति को जारी करना।

खोलना या बांधना, यह घोषणा करना है — “जो स्वर्ग में है — वह पृथ्वी पर प्रकट हो; जो स्वर्ग में नहीं है — वह पृथ्वी पर रुक जाए।”

यीशु ने कहा — *“जो कुछ तुम बाँधोगे, यह वही होना चाहिए जो स्वर्ग में पहले से बाँधा गया है।”*

इसलिए रहस्य है — *सामंजस्य (Alignment) में जीना*

यह हमारी इच्छा नहीं, बल्कि *स्वर्ग की इच्छा से सहमति* है। इसलिए *पवित्र आत्मा* आवश्यक है — वह स्वर्ग की मनसा प्रकट करता है, ताकि जो कुछ हम बाँधें या खोलें, वह मानव मत नहीं, बल्कि *परमेश्वर की व्यवस्था* को दर्शाए।

🙌 *हालेलूयाह!*

मसीही में आपका भाई,

प्रेरित अशोक मार्टिन

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