“दोषारोपण की बेड़ियाँ और समर्पण की स्वतंत्रता”
और उनकी नाईं तुम कुड़कुड़ाओ मत, जिस कारण से वे कुड़कुड़ाते थे और नाश करनेवाले के द्वारा नाश किए गए। (1 कुरिन्थियों 10:10)
दोषारोपण अदन की वाटिका से शुरू हुआ। आदम ने हव्वा को दोषी ठहराया। हव्वा ने सर्प को। तब से मनुष्य का हृदय जिम्मेदारी से भागकर दूसरों को दोष देने में ही सुख पाता है।
_“मनुष्य की मूर्खता उसका मार्ग बिगाड़ देती है, और उसका मन यहोवा पर भड़क उठता है।”_ (नीतिवचन 19:3) जब लोग दूसरों को दोष देते हैं तो वे अपने आप को अन्याय का शिकार समझते हैं। वे कड़वाहट पाल लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर और मनुष्यों ने उनके साथ अन्याय किया है।
दोषारोपण समर्पण का विरोध करता है। यह झुकने से इंकार करता है। यह पश्चाताप से छिप जाता है और आत्म-दया से चिपका रहता है। दोष देने वाला हृदय कभी आभारी नहीं हो सकता। वह परमेश्वर के किए हुए को भूल जाता है और जो नहीं किया उस पर ध्यान लगाता है।
इस्राएलियों ने जंगल में कुड़कुड़ाकर परमेश्वर को अन्यायी ठहराया। जबकि मन्ना प्रतिदिन उनके चरणों में गिरता था। शिकायत ने उन्हें उसकी करुणाओं से अंधा कर दिया। उसी प्रकार जब कृतज्ञता अनुपस्थित होती है, आत्मा उसी परमेश्वर से दूर हो जाती है जो उसका पालन-पोषण करता है।
दोष अलग करता है। धन्यवाद मिलाता है। समर्पण अनुग्रह का द्वार खोलता है। जब हम उंगली उठाना छोड़कर धन्यवाद में हाथ उठाते हैं, तब परमेश्वर पुनर्स्थापित करता है, चंगा करता है और सब कुछ हमारे भले के लिए करता है।
आपका मसीही भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन