*आज्ञाकारिता और बलिदान*

`देखो, आज्ञा मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। 1 शमूएल 15:22`
जिस क्षण आप नया जन्म लेते हो, आपका जीवन आपका नहीं रह जाता, वास्तव में आपका जीवन तो पहले से ही आपका नहीं था, यह उस आत्मा को समर्पित हो जाता था जिसे आपने अपना हृदय दिया था, चाहे वह अंधकार की हो या प्रकाश की। लेकिन अब जब आप परमेश्वर के पास आ गए हो, तो आपकी सारी सांसारिकता, सारी शारीरिक इच्छाओं को त्यागकर परमेश्वर के राज्य में उच्च अधिकार के साथ घनिष्ठता में बढ़ना चाहिए।
यदि आप अमर लोगों में गिने जाना चाहते हो, तो आपको घनिष्ठता में बढ़ना चाहिए। यदि तुम पृथ्वी पर स्वर्ग के आयामों को संचालित करने के लिए अधिकार प्राप्त करना शुरू नहीं करते, तो आप स्वर्ग में नहीं जाने पाओगे। जब आप स्वर्ग जाओगे, तो क्या तुम्हें एक सिद्ध सेनापति या योद्धा के रूप में या एक विदेशी, एक साधारण व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाएगा। हमें परमेश्वर के वचन को अपने भीतर लेने में समय बिताना चाहिए, परमेश्वर के जीवन का दोहन करना चाहिए, यह हमारे अंदर परमेश्वर के जीवन की गंभीरता और पूर्णता है जो यह निर्धारित करती है कि हम कितने वजनदार हैं, मसीह में हमारा स्थान कितना है।
यह परमेश्वर के वचन के माध्यम से उसके साथ घनिष्ठता है जो जीवन को उत्पन्न करती है, जो अधिकार भी देती है, क्योंकि यदि आपके अंदर परमेश्वर के जीवन की पूर्णता नहीं है जो यीशु है तो आपके पास अधिकार नहीं हो सकता। आपके पास अधिकार की कमी का एक कारण यह है कि आपके पास वचन, प्रार्थना और बलिदान (शरीर की मृत्यु) की कमी है। जब तक हमारे पास आज्ञा मानने वाले लोग नहीं होंगे, तब तक अंधकार कायम रहेगा।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन