बुधवार // 6 नवंबर 2024

* प्रभु की सेवा आत्मा से करो!*
*परमेश्वर जिस की सेवा मैं अपनी आत्मा से उसके पुत्र के सुसमाचार के विषय में करता हूंहूँ!*
*रोमियों 1:9*
परमेश्वर की सेवा करने के दो तरीके हैं। एक है शरीर की शक्ति से सेवा करना; दूसरा है आत्मा की शक्ति से सेवा करना। शरीर में परमेश्वर की सेवा करने का मतलब है अपनी प्राकृतिक क्षमताओं पर भरोसा करना, जो आपको जन्म से ही प्राप्त हुई हैं – आपकी प्राकृतिक प्रतिभा, बुद्धि, वरदान आदि। आत्मा में सेवा करना बिलकुल अलग है। आज की आयत में पौलुस के शब्दों पर विचार करें। इसके अलावा, वह रोमियों 7:6 में वह कहता है कि _व्यवस्था: जिस के बन्धन में हम थे उसके लिये मर कर, अब व्यवस्था से ऐसे छूट गए, कि लेख की पुरानी रीति पर नहीं, वरन आत्मा की नई रीति पर सेवा करते ।_
हमारे प्रभु यीशु का अद्भुत जीवन और सेवकाई इस बात की गवाही देती है कि उन्होंने अपनी प्राकृतिक शक्तियों से जीवन नहीं जिया। बल्कि, वह अपने पिता के जीवन के अनुसार जीया, जो पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें वास करता था।
_यीशु ने उन्हें यह उत्तर दिया: “मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है।”_ (यूहन्ना 5:19)। आगे यीशु यूहन्ना 6:57 में कहते हैं कि _जैसा जीवते पिता ने मुझे भेजा और मैं पिता के कारण जीवित हूं वैसा ही वह भी जो मुझे खाएगा मेरे कारण जीवित रहेगा।_
जब परमेश्वर के कार्य की बात आती है, तो प्रभु हमारे प्राकृतिक कौशल, ऊर्जा और प्रतिभा पर भरोसा करने से मना करते हैं। इसके बजाय, वह हमें “आत्मा में” सेवा करने के लिए बुलाता है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर की सेवा करने के लिए आप उसकी उपस्थिति जो आपके भीतर वासll करती है, उस पर पूर्ण तरह निर्भर रहें और उस पर पूरी तरह से भरोसा करे।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन
Hallelujah 🙏🙏🙏🙏