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‘दोष’ का मूल कारण ‘शर्म’ है।

गुरुवार // 29 फरवरी 2024 ‘दोष’ का मूल कारण ‘शर्म’ है। परमेश्वर ने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे बर्जा था, क्या तू ने उसका फल खाया है? आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया। तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया। (उत्पत्ति 3:11-13) शर्म विचलित करने वाली बात है। एक बार जब हम इसमें पहुँच जाते हैं, तो हम यह याद नहीं कर पाते कि आखिर हम वहाँ कैसे पहुँचे। शर्म एक बड़ा बवंडर है जो आपकी अद्भुत पहचान को ख़त्म कर देता है। हमें बस इतना याद रहता है कि हमारे साथ सचमुच कुछ बुरा हुआ था। फिर, जब कोई आश्वासन नहीं मिलता, तो हम ऐसा सोचने लगते हैं कि बुरी चीजें बुरे लोगों के साथ ही होती हैं। हो सकता है कि आप वास्तव में बुरे लोगों-दुष्ट लोगों-द्वारा पीड़ित किये गये हों। लोग तो दुष्ट हैं क्योंकि दुष्टता उनके हृदय में है। ऐसे लोग अपनी दुष्टता में आपको दोष देकर अपना बचाव कर सकते हैं। उनका आरोप लगाना गुस्सा और आत्मविश्वास से पूर्ण होता है, और आत्मविश्वासी लोगों से असहमत होना मुश्किल होता है। लेकिन वह झूठ है। यीशु और उनके शिष्य वास्तव में बुरे लोग नहीं थे, लेकिन उनके साथ तो में बुरी चीज़ें घटित हुईं। इसलिए याद रखें कि बहुत अच्छे लोगों के साथ भी बुरी चीजें हो सकती हैं। यह सोचकर स्वयं को दोष न दें कि खुद पर दोष लगाने से आपके पास अधिक नियंत्रण होगा। यदि जो कुछ भी गलत हुआ या जिसने आपको चोट पहुंचाई उसके लिए आप जिम्मेदार हैं तो बस यह पता लगाने का प्रयास करें कि इसे दोबारा होने से कैसे रोका जाए। आप ऐसा तब कर सकते हैं जब आपकी इंद्रियाँ परमेश्वर के वचन के अनुसार सोचने के लिए प्रशिक्षित हों। आइए हम यीशु के अनमोल नाम से सभी शर्मिंदगी से छुटकारा पाने की कृपा प्राप्त करें। आमीन ! मसीह में आपका भाई, प्रेरित अशोक मार्टिन

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