
*सही आशाओं की शांति*
ऐ मेरी जान, ख़ुदा ही की आस रख, क्यूँकि उसी से मुझे उम्मीद है। भजन संहिता 62:5
दाऊद ने घोषणा की, *“हे मेरे प्राण, केवल परमेश्वर ही की बाट जोह; क्योंकि मेरी आशा उसी से है”* (भजन संहिता 62:5)। सच्ची सुरक्षा हमारी आशा को ऊपर की ओर लगाने में है, न कि बाहर की ओर। हर अगुवा भी तो एक इंसान ही हैं। वे ठोकर खा सकते हैं, असफल हो सकते हैं या थक सकते हैं। पौलुस और बरनाबास ने पुकारकर कहा, *“हम भी तुम्हारे समान मनुष्य हैं”* (प्रेरितों 14:15)। जब हम इसे भूल जाते हैं, तो धोखा हो जाता है।
मसीह की देह में कई घाव गलत आशाओं के बंधन से आते हैं। बाइबल चेतावनी देती है, *“जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, वह श्रापित है”* (यिर्मयाह 17:5)। जब हम लोगों से अत्यधिक अपेक्षा रखते हैं, तो निराशा अवश्य होती है।
पौलुस ने कलीसिया को स्मरण दिलाया, *“इसलिये न तो लगाने वाला कुछ है, और न सींचने वाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ाने वाला है (1 कुरिन्थियों 3:7)*। कोई बोता है, कोई सींचता है, पर वृद्धि केवल परमेश्वर ही देता है। अनियंत्रित अपेक्षा दिल तोड़ देती है, पर संतुलित विश्वास हमें सत्य में स्थिर रखता है।
बाइबल कहती है, *“तू सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रख”* (नीतिवचन 3:5)। मनुष्यों पर नहीं, यहोवा पर झुक। जब हमारी आशाएँ परमेश्वर की इच्छा से मेल खाती हैं, तो शांति मिलती है। *“परमेश्वर की शांति तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों की रक्षा करेगी”* (फिलिप्पियों 4:7)। मनुष्य में आशा हमेशा असफल होती है, पर परमेश्वर में आशा कभी असफल नहीं होती।
मसीह में आपका भाई,
*प्रेरित अशोक मार्टिन*