गुरुवार // 11 जनवरी 2024
“धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।” – मत्ती 5:3
इतिहास में पहली बार सम्मान और दरिद्रता एक साथ देखने को मिलते है। प्रभु चाहते हैं कि हम दीनों पर विचार करें, जो इस प्रचार के मुख्य श्रोता थे। यीशु मसीह चाहते हैं कि हम इसी दीनता में और भी गहराई में जाएँ। यह बिल्कुल अनुचित होगा यदि केवल दीन और बेसहारा लोग ही स्वर्ग-राज्य का हिस्सा बनें, लेकिन आत्मिक रूप से गरीब हर कोई हो सकता है। आत्मा में दीनता वह हैं जब इस गहरे अहसास के साथ जीते हैं कि उन्हें हर बात में, चाहे आत्मिक हो या शारीरिक , सारी जरूरतों के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना है।
आत्मिक गरीब होने का अर्थ अहंकार का पूर्ण अभाव होना है, आत्म-भरोसा और आत्म-निर्भरता का पूर्ण अभाव होना है। इसका अर्थ यह आभास होना है कि परमेश्वर की उपस्थिति के बिना हम कुछ भी नहीं हैं। हम इसे खुद से उत्पन्न नहीं कर सकते। जब हम परमेश्वर के आमने-सामने आते हैं तो हमें हमारी पूर्ण शून्यता का आभास होता है। यही आत्मिक दरिद्रता है।
मनुष्य के सामने शून्य हो जाना एक अभिशाप सा जान पड़ता है, जबकि परमेश्वर के समक्ष शून्यता एक ऐसी चीज़ है जिस पर हम गर्व कर सकते है। यह एक आशीष है। यह सम्मानीय है। हम इसी तरीके से जीने के लिए बनाए गए हैं।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन
“धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।” – मत्ती 5:3
इतिहास में पहली बार सम्मान और दरिद्रता एक साथ देखने को मिलते है। प्रभु चाहते हैं कि हम दीनों पर विचार करें, जो इस प्रचार के मुख्य श्रोता थे। यीशु मसीह चाहते हैं कि हम इसी दीनता में और भी गहराई में जाएँ। यह बिल्कुल अनुचित होगा यदि केवल दीन और बेसहारा लोग ही स्वर्ग-राज्य का हिस्सा बनें, लेकिन आत्मिक रूप से गरीब हर कोई हो सकता है। आत्मा में दीनता वह हैं जब इस गहरे अहसास के साथ जीते हैं कि उन्हें हर बात में, चाहे आत्मिक हो या शारीरिक , सारी जरूरतों के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना है।
आत्मिक गरीब होने का अर्थ अहंकार का पूर्ण अभाव होना है, आत्म-भरोसा और आत्म-निर्भरता का पूर्ण अभाव होना है। इसका अर्थ यह आभास होना है कि परमेश्वर की उपस्थिति के बिना हम कुछ भी नहीं हैं। हम इसे खुद से उत्पन्न नहीं कर सकते। जब हम परमेश्वर के आमने-सामने आते हैं तो हमें हमारी पूर्ण शून्यता का आभास होता है। यही आत्मिक दरिद्रता है।
मनुष्य के सामने शून्य हो जाना एक अभिशाप सा जान पड़ता है, जबकि परमेश्वर के समक्ष शून्यता एक ऐसी चीज़ है जिस पर हम गर्व कर सकते है। यह एक आशीष है। यह सम्मानीय है। हम इसी तरीके से जीने के लिए बनाए गए हैं।
मसीह में आपका भाई,
प्रेरित अशोक मार्टिन
Yes Amen 🙌💯✝️